हुई क्या बात ऐसी जो पथिक उस राह को भूला;
वही थे बाग़ अब भी , और वही सावन का था झूला;
भूल सकते हम नहीं जब तक न चाहें भूलना;
थी यही इच्छा हमारी, बाग़ में न झूलना;
राहें नयी मिल जाने से ये पुराने रास्ते;
बंद नहीं होते हैं फिर भी हमारे वास्ते;
आगे बढ़ो, बढ़ते चलो, पाओ नयी तुम मंजिलें;
भूलना उनको नहीं, तुमको मिले जो दिलजले;
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