मन तेरा कैसे मान करूँ !!!
पुष्पों पर भंवरों का गुंजन,
पत्तों पर चिड़ियों का कलरव,
रिमझिम से गिरते सावन में,
अनकहे प्रेम का ये बंधन.
मेरे इस शून्य ह्रदय में जब,
सब सूना सूना लगता था,
आकाश धरा का दूर मिलन,
जब इक मिथ्या सा लगता था.
तब तुम आये अभिलाषा बनकर,
सुन्दरता की आशा बनकर,
तुमने दिखलाया ये सब,
तेरा कैसे सम्मान करूँ !!!
मन तेरा कैसे मान करूँ !!!
No comments:
Post a Comment