कभी पर्वत पे ढूँढा था, कभी मधुबन में ढूँढा था;
शहर से दूर जाकर के घटा औ घन में ढूँढा था;
अमीरों की हवेली में, तुम्हे निर्धन में ढूँढा था;
दिवस की आंच में भी और रात के तम में ढूँढा था;
कहाँ तुम खो गए थे प्रिय तुम्हे हर जन में ढूँढा था.
मुझे प्रिय ढूँढने में हाय इतनी क्यों मशक्कत की;
मैं खोया ही कहाँ था जो ज़माने भर में खोजे तुम;
जगह की दूरियों को नापने में क्यों भटकते थे;
सदा से था तुम्हारे पास क्या अपने मन में ढूँढा था !
शहर से दूर जाकर के घटा औ घन में ढूँढा था;
अमीरों की हवेली में, तुम्हे निर्धन में ढूँढा था;
दिवस की आंच में भी और रात के तम में ढूँढा था;
कहाँ तुम खो गए थे प्रिय तुम्हे हर जन में ढूँढा था.
मुझे प्रिय ढूँढने में हाय इतनी क्यों मशक्कत की;
मैं खोया ही कहाँ था जो ज़माने भर में खोजे तुम;
जगह की दूरियों को नापने में क्यों भटकते थे;
सदा से था तुम्हारे पास क्या अपने मन में ढूँढा था !
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