बड़ा बेमानी लगता है;
सुबह जो मेरे घर कि जब कहीं की सांझ होती है,
यहाँ पर सूर्य इतराता है, शाखाओं से पेड़ों की,
वहां मदहोश होने की, चाँद की तैयारी होती है,
यहाँ पर आँख खुलती है, लिहाफों के घरोंदो में,
वहां बुझती सी पलकों पर नींदें भारी होती हैं,
ये दूरी है समय की या धरा भूगोल ऐसा है,
की जगना दो घरों का साथ में, दुशवारी होती है,
कहीं इक मौका मिलता, साथ दिख जाते शशि को;
वरना ज़िन्दगी में कितनी ही लाचारी होती है,
बड़ा बेमानी लगता है....
सुबह जो मेरे घर कि जब कहीं की सांझ होती है,
यहाँ पर सूर्य इतराता है, शाखाओं से पेड़ों की,
वहां मदहोश होने की, चाँद की तैयारी होती है,
यहाँ पर आँख खुलती है, लिहाफों के घरोंदो में,
वहां बुझती सी पलकों पर नींदें भारी होती हैं,
ये दूरी है समय की या धरा भूगोल ऐसा है,
की जगना दो घरों का साथ में, दुशवारी होती है,
कहीं इक मौका मिलता, साथ दिख जाते शशि को;
वरना ज़िन्दगी में कितनी ही लाचारी होती है,
बड़ा बेमानी लगता है....
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