जब बेटे की जिद्द,
माँ के वात्सल्य काजल को,
आँखों से पहले ही रोक लेती है......
जब पिता का क्रोध,
पुत्र की बढ़ती उम्र देख,
बीच में थम जाता है...
जब एक स्वर्ण मुद्रिका,
आपसी उँगलियों की धार,
बन जाती है....
जब बूढी हड्डियों के,
गलने से पूर्व ही,
धरा बँट जाती है...
तब अनायास ही सोचता हूँ,
ये दिवस का,
अवसान है या समापन.
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