Saturday, February 5, 2011

क्या लौटेगी प्रकृति

बयां करते हैं दो सहमे हुए से वृक्ष बच्चों को,
आमों का खड़ा इक बाग़ था कभी तेरे गाँव में,
झूला झूलती थी माँ तुम्हारी और सखियाँ भी,
जो आता था यहाँ सावन सदा भीगी हवाओं में.

...कभी क्या लौटेंगे वो दिन, मोर जब फिर से नाचेंगे,
कभी क्या लौटेगी बरसात मोती सी तेरे आँगन में,
कभी क्या लौटेंगे वो वृक्ष बाग़ में झूला झूलेंगे,
कभी क्या लौटेगी सौगात प्रकृति कि तेरे आँचल में.

No comments:

Post a Comment