महज़ विचारों में तुम हमको देख लेते हो;
और हम आलिंगन में भी अपनत्व ढूंढते हैं ;
हमने सोचा तुम नहीं समझोगे मन की इस व्यथा को;
इसलिए चुपचाप सिल कर होंठ अपने चल रहा;
पर गलत आँका था हमने उस ह्रदय की चेतना को;
न वरन समझा अपितु मेरी व्यथा को भी सहा;
खुले गगन में तुम सतरंगी देख लेते हो;
और हम घटाओं में भी मेघ ढूंढते हैं.....
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