Saturday, September 7, 2013

खोने का डर और न पाने की शंका जब अपना मुहं बा देती ई तो खुद की परछाईं भी सर ओढ़ कर निकलती है  …. भरोसा भी किया और फैसला भी  …. फिर उलझन क्यूँ
सरकते सरकते दिन का लिहाफ चारपाई के नीचे लटक आया  …. फिर रात की ठण्ड में दिलासा को ओढ़ा  …. सुबह फिर कभी वैसी नहीं आई
देर रात पड़ोस से कुछ चिल्लाने की आवाजें आयीं  … बालकनी में समय रुका रहा 
सुबह आठ बजे की खुली आँख नौ बजे तक बंद रही और सब दीखता रहा  ….
याद आया की आज तीज है और इतवार भी  ….  कुछ कपड़े बाल्टी में साँस रहे हैं
पानी की मोटर चलाई तो सन्नाटा हिला  …. सब कुछ करने को है और कुछ भी नहीं  …
एनादर सन्डे इज़ टीजिंग मी !

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