इकट्ठा करके बिखरे ख्वाबों को, हमने टुकड़े थे यूँ सदा ढोये,
जैसे कोई जोत ले इन खेतों को, और फिर उम्र भर नहीं बोये;
जैसे कोई जोत ले इन खेतों को, और फिर उम्र भर नहीं बोये;
कभी यूँ भी मेरी राहों में, कुछ अज़ीज़ मिले हैं 'नीरज'
जैसे कोई दीया बुझा तो दे, और फिर रात भर नहीं सोये;
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