गुज़रे पहाड़ में वादी सी,
इस जटिल समय में सादी सी,
स्वपनों के मीठे आँगन में,
यादों की तुम आबादी सी,
तुम इतने अधिक ज़रूरी हो,
ज्यों किसान को जोत बही,
ज्यों किसान को जोत बही,
तुम भूले बिसरे गीत सही;
बोध अबोध अकिंचन सी,
माथे पर ठहरी चिंतन सी,
मूरत दधीच के अर्पण सी,
प्रतिबिम्ब ज्ञान के दर्पण सी,
तुम अब भी व्याख्या चाहत की,
जब कोई चाहत रही नहीं ,
तुम भूले बिसरे गीत सही;
अनवरत प्रेम की पाती सी,
अनवरत प्रेम की पाती सी,
तुम सांयकाल की बाती सी,
सावन में महके गांवों की,
तुम जोगन वही बिसाती सी,
तुम जोगन वही बिसाती सी,
तुम ही उस बात के साखी हो,
जो हमने अब तक कही नहीं,
तुम भूले बिसरे गीत सही;
जो हमने अब तक कही नहीं,
तुम भूले बिसरे गीत सही;
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