बागों में लगाया अपना पेड़,
कैसे जान पाऊंगा,
उन हथेलियों पर सुर्ख लहू,
कैसे पहचान पाउँगा,
कुछ रहे या बिखरे 'नीरज',
अब लौट कर नहीं जाऊंगा !
कैसे जान पाऊंगा,
उन हथेलियों पर सुर्ख लहू,
कैसे पहचान पाउँगा,
कुछ रहे या बिखरे 'नीरज',
अब लौट कर नहीं जाऊंगा !
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