एक दिवस जब जीवन पथ पर,
भूख लगी थी हमको कस कर,
अभी दूर था हमको जाना,
भोजन का था नहीं ठिकाना,
पर किस्मत की अपनी आभा,
छोटा सा इक दिखा था ढाबा,
हम बिलकुल भी न सकुचाये,
गाड़ी रोकी कदम बढ़ाये,
जर्जर सी दीवार खड़ी थी,
जिस पर कालिख खूब चढ़ी थी,
उसपर सटी बांस की सीढ़ी,
जिसने देखी कितनी पीढ़ी,
क्रम में चार पड़ी थी खटिया,
सब पर एक बिछी थी पटिया,
हम भी इक खटिया पर बैठे,
मार पालथी थोड़ा ऐंठे,
पटिया को दे थोड़ा धक्का,
काला चश्मा उस पर रक्खा,
लगे देखने हम मोबाइल,
होठों पर आई स्माइल,
तभी एक आवाज़ ने रोका,
आँख उठा कर हमने देखा,
भाग्य बना था जिसका चालक,
सम्मुख था अबोध सा बालक,
आँखें बुझी हुई तारा सी,
उमर रही होगी बारह सी,
बाहें जैसे इक टहनी थी,
नेकर घुटनों तक पहनी थी,
काँधे पर मैला सा गमछा,
देख रहा था थोड़ा तिरछा,
बाल भी उसका बढ़ा हुआ था,
लिए गिलास जग खड़ा हुआ था,
भर गिलास में पानी आधा,
और जरा उचका कर कांधा ,
पूछा, साहेब क्या खाएंगे,
जो कहियेगा ले आएंगे,
हमने उसको ध्यान से देखा,
उसके माथे नहीं थी रेखा,
होती किस्मत ज्यादा, कम भी,
संभल गए थे अब तक हम भी,
जान भूख से जाने को है,
पूछा क्या क्या खाने को है,
भिंडी, पालक, आलू गोभी,
पीली दाल, छास भी होगी,
लेकिन राज़ की बात बताऊँ,
इच्छा हो तो बियर पिलाऊँ,
अपलक हमने उसको देखा,
माथे पर आ गयी थी रेखा,
हमने कहा नहीं, रहने दो,
रोटी दाल छास बहने दो,
अभी दूर जाना है हमको,
गाड़ी बहुत चलाना हमको,
जैसे तैसे खाना खाया,
रुपिया अस्सी नगद चुकाया,
सोचा मिले है क्या किसको भी,
रुपिया बीस दिया उसको भी,
रस्ते अपने बैठ सिकुड़ के,
एक बार देखा फिर मुड़ के,
गमछा टांग, पकड़ कर सीढ़ी
फूंक रहा था बालक बीड़ी,
एक दिवस जब जीवन पथ पर,
भूख लगी थी हमको कस कर ;
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