पहले आशाओं की हवेली ,
फिर आशंकाओं की पहेली,
कभी तो चमक आँखों में,
कभी पसीने की हथेली;
वो हाथ पैरों का फूल जाना,
वो बाकी सब कुछ भूल जाना,
कितना कुछ सोचना चुपचाप,
कभी कम या उच्च रक्तचाप;
डॉक्टर और बुजुर्गों की,
बातों का विरोधाभास,
वो कोख में होती हलचल,
और ममता का आभास ;
फिर पीड़ा .... असहनीय,
वो स्थिति .... दयनीय,
ससुराल की आशा, बाबुल का बंधन,
पल भर शांति, फिर परिचित सा क्रंदन,
कोख स्त्री के स्वयं का विस्तार होता है,
और जनना उसका नया अवतार होता है,
और जनना उसका नया अवतार होता है,
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