Wednesday, March 2, 2011

कल का भरोसा ही क्या

जब तमाम उम्र की पीड़ा,
सिकुड़ कर
हमसाया सी बन जाती है,
जब पारिवारिक वेदनाएं,
विपरीत घरेलू माहौल में
दोस्ती पर भारी पड़ जाती है,
तो कुछ भी करने से डरता हूँ,
और गुमसुम बैठा रहता हूँ.

तुम्हे किस तरह से समझा पाउँगा,
जब तुम नहीं थे,
जीवन कहाँ थमा था,
अब तुम हो,
तो जीवन कहाँ थमा है,
किसी दिन मैं भी चला जाऊंगा,
कई मुद्दतों के,
खाली इंतज़ार के बाद,
तुम मिले हो,
इतनी पीड़ा अकेले,
कैसे सह पाउँगा,
और तुमसे ही नाराज़ हो गया,
तो कल का भरोसा ही क्या,
आज ही,
मर जाऊंगा.

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