अब भी उम्मीद लगाये बैठा हूँ,
उन पहचानी सी सड़कों पर,
कोई हाथ हिलाएगा,
मैं रुक जाऊंगा .....
नादान हूँ मैं ....
इतना भी नहीं समझता,
वक़्त की बेरहम करवट है;
कब तक उम्मीदों में जी पाउँगा,
एक दिन सड़क भी,
पहचानने से इनकार कर देगी,
तब उम्मीदों में ही....
गुज़र जाऊंगा.
उन पहचानी सी सड़कों पर,
कोई हाथ हिलाएगा,
मैं रुक जाऊंगा .....
नादान हूँ मैं ....
इतना भी नहीं समझता,
वक़्त की बेरहम करवट है;
कब तक उम्मीदों में जी पाउँगा,
एक दिन सड़क भी,
पहचानने से इनकार कर देगी,
तब उम्मीदों में ही....
गुज़र जाऊंगा.
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