उस पहाड़ के पीछे,
अब भी एक नदी बहती है,
वहीँ पर...चुपचाप,
किनारे पड़ी एक कश्ती है,
जिसकी बोझिल होती सी,
अपनी एक हस्ती है,
वह अपलक देखती है... दूर,
जहाँ नाविकों की बस्ती है;
अब वो इंतज़ार नहीं करती,
घूरती है रेंगते केकड़ों को,
अब ये नदी,
उससे प्यार नहीं करती,
शनैः शनैः
इसकी उम्र ढल जायेगी,
लकड़ी ही है,
एक दिन पानियों में गल जायेगी;
अब भी एक नदी बहती है,
वहीँ पर...चुपचाप,
किनारे पड़ी एक कश्ती है,
जिसकी बोझिल होती सी,
अपनी एक हस्ती है,
वह अपलक देखती है... दूर,
जहाँ नाविकों की बस्ती है;
अब वो इंतज़ार नहीं करती,
घूरती है रेंगते केकड़ों को,
अब ये नदी,
उससे प्यार नहीं करती,
शनैः शनैः
इसकी उम्र ढल जायेगी,
लकड़ी ही है,
एक दिन पानियों में गल जायेगी;
perhaps one fels like this boat when one retires!
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