Tuesday, December 6, 2011

एक कश्ती

उस पहाड़ के पीछे,
अब भी एक नदी बहती है,
वहीँ पर...चुपचाप,
किनारे पड़ी एक कश्ती है,
जिसकी बोझिल होती सी,
अपनी एक हस्ती है,
वह अपलक देखती है... दूर,
जहाँ नाविकों की बस्ती है;

अब वो इंतज़ार नहीं करती,
घूरती है रेंगते केकड़ों को,
अब ये नदी,
उससे प्यार नहीं करती,
शनैः   शनैः
इसकी उम्र ढल जायेगी,
लकड़ी ही है,
एक दिन पानियों में गल जायेगी;

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