एक दो रोज़ में हर आँख ऊब जाती है ;
दिल को मंजिल नहीं रस्ता समझने लगते हैं ;
जिनको हासिल नहीं व्हो जान देते रहते हैं ;
जिनको मिल जाऊं व्हो सस्ता समझने लगते हैं .
कुमार विश्वास की ये पंक्तियाँ इससे सटीक पहले कभी नहीं बैठी . इन अंधेरों की गर्मी में करवटें बदलते हुए यूँ प्रतीत होता है मानो इतिहास दोहराया जा रहा है ...या फिर वही कथा फिर से कोई बांच रहा है जो अतीत के दरवाज़ों को आधा खोल देता है ...न अन्दर का पूरा दिखाई देता है न बाहर का . ये आपकी समझ में शायद न आये .
हम बहुत से काम अक्सर ऐसा करते हैं जिससे दूसरे को दुःख न हो ....या शायद वह खुश रह सके .... बचपन में ये अच्छा लगता था ....बड़े होते होते ऐसा लगने लगा मानो ये कोई त्याग है ...किसी दूसरे का हमारे प्रति . और अब जब एक बार फिर से बच्चा बनने का जी चाहता है तो ये एक उपकार लगता है ...और नींदों में मैं चीखता रहता हूँ . 'मुझपर उपकार मत करो '...मैं कोई ठहरी हुई , लाचार सी वस्तु नहीं ...मैं कोई भंवर में फंसी नाव नहीं ...कोई डूबता नाविक भी नहीं ....
मैं भी एक अस्तित्व हूँ ...एक आकार... अपने अवगुणों समेत ..माना की मेरा ढांचा शायद बेढंगा है ...पर सपने मैं भी बुनता हूँ ...हँसता हूँ ...रोता हूँ .... मेरा अपना शरीर है हाड़ मांस का ...कटने पर अब भी लहू रिसता है ....इसका भी रंग सुर्ख है ...मेरा भी अपना एक चाँद है ...उस बादल की ओट में ...धुंधला ही सही ...पर अपना ...अलग सा .
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