Thursday, May 9, 2013

रुकी रैन गुज़रती, निश्चित ही सवेरा होता,
थोड़ा ही सही पर अपना भी बसेरा होता,
अब बहुत सोचने से क्या हासिल 'नीरज', 
कभी अपना कहीं ज़िक्र तो छोड़ा होता .... 

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