रास्तों के जुगनू
Wednesday, May 15, 2013
ये शनै शनै सरकता समय,
कुछ और उभरती पीड़ा,
फिर बिखर जाने की शंका,
और न पाने का डर,
सांझ की अनमनी व्हिस्की,
कहीं भरोसे की हिचकी,
सान्त्वना का गिलास,
आशंकाओं की हथेली,
उसका सब्र,
मेरी अलग पहेली,
कोशिशों के थकान की,
ये कैसी लाचारी है,
क्यूँ अनदेखा कल,
आज पर भारी है ....
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