इन जाड़ों में,
कुहासे से ढके तन को,
ओस से भीगे मन को,
ठिठुरती भावनाओं को,
कांपती आशाओं को,
हाथ सेंकती धीरता को,
रजाई में लुकी वीरता को,
कुछ हद तक हम वापिस लायें,
आओ थोड़ी धूप जगाएं ........
कुहासे से ढके तन को,
ओस से भीगे मन को,
ठिठुरती भावनाओं को,
कांपती आशाओं को,
हाथ सेंकती धीरता को,
रजाई में लुकी वीरता को,
कुछ हद तक हम वापिस लायें,
आओ थोड़ी धूप जगाएं ........
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