निज़ी तुम थे,
और निज़ी थी वो बातें,
गुजरी थीं जिनमे रातें,
ऊँची मंजिलों के छज्जों पर,
आज सब आम होते देख,
दुःख होता है ...
माना मैं बुद्धिजीवी नहीं,
कार्यकुशल नहीं,
बड़ा भी नहीं,
पर आदमी तो हूँ ......
और निज़ी थी वो बातें,
गुजरी थीं जिनमे रातें,
ऊँची मंजिलों के छज्जों पर,
आज सब आम होते देख,
दुःख होता है ...
माना मैं बुद्धिजीवी नहीं,
कार्यकुशल नहीं,
बड़ा भी नहीं,
पर आदमी तो हूँ ......
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