धूप हुई ओझल नज़र से रात भी कुछ कह गयी,
शाम थीं दोनों सहेली फिर अकेली रह गयी,
एक जाने के लिए थी एक का आना था तय,
मिलन की इस कश्मकश में इक नवेली रह गयी,
उलझनों की भीड़ में खोकर ये जाना हमकदम,
प्रीत है ऐसी की कोई पल में जी ले दो जनम,
हर किसी को शाम में मिलता कहाँ दोनों जहाँ,
लाख सुलझाई मोहब्बत इक पहेली रह गयी .
....... neeraj tripathi
शाम थीं दोनों सहेली फिर अकेली रह गयी,
एक जाने के लिए थी एक का आना था तय,
मिलन की इस कश्मकश में इक नवेली रह गयी,
उलझनों की भीड़ में खोकर ये जाना हमकदम,
प्रीत है ऐसी की कोई पल में जी ले दो जनम,
हर किसी को शाम में मिलता कहाँ दोनों जहाँ,
लाख सुलझाई मोहब्बत इक पहेली रह गयी .
....... neeraj tripathi
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