किन्ही रातों में अचानक कोई ख़याल आता है,
बिना मदिरा के कैसे ये आलम बहक जाता है,
छोड़ कर रस्मोरिवाज़, लाँघ दीवारेतहज़ीब,
ये मचलता बेतुका मन कहाँ कहाँ जाता है ....
बिना मदिरा के कैसे ये आलम बहक जाता है,
छोड़ कर रस्मोरिवाज़, लाँघ दीवारेतहज़ीब,
ये मचलता बेतुका मन कहाँ कहाँ जाता है ....
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