मूक आईना,
खामोश प्रतिबिम्ब,
और चुप्पी साधे परछाई,
अक्सर बहुत शोर करते हैं।
रोज़ इस शोरगुल में,
अपना अक्स ढूंढता हूँ,
इधर उधर से मिला जुला कर,
एक स्वयं बनाता हूँ,
और शोर में खो जाता हूँ,
एक दिन और गुज़र जाता है,
पर अगले दिन भी आईना बोलता नहीं .....
खामोश प्रतिबिम्ब,
और चुप्पी साधे परछाई,
अक्सर बहुत शोर करते हैं।
रोज़ इस शोरगुल में,
अपना अक्स ढूंढता हूँ,
इधर उधर से मिला जुला कर,
एक स्वयं बनाता हूँ,
और शोर में खो जाता हूँ,
एक दिन और गुज़र जाता है,
पर अगले दिन भी आईना बोलता नहीं .....
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