ये ऊँचा नीचा रास्ता पार करने में मुझे कुछ पंद्रह मिनट का समय लगता है। इस्कॉन मंदिर के पीछे निकलता ये रास्ता मुझे नेहरु प्लेस मेट्रो स्टेशन ले जाता है जहाँ से मैं ऑफिस के लिए मेट्रो ट्रेन पकड़ता हूँ। ये पंद्रह मिनट मेरे दिन के सब से सुखदायी क्षण हैं। एक भागती दुनिया के बीच में ठहरे हुए पंद्रह मिनट ...इन्हें मैं पूरा जीता हूँ। एक महीने के अंतराल के बाद जब दिल्ली लौटा और इस पथ पर अपने कदम बढ़ाये तो एक विस्मृत करने वाली रंग-बिरंगी छटा देखने को मिली। लाल हरे सफ़ेद पीले बैंगनी और न जाने कितने ही रंग फ़ैल गए हैं इस मैदान के आँचल में ...यह अलौकिक है ...घर में पिताजी की तबियत बिगड़ जाने पर महीने भर पहले जब मैंने दिल्ली छोड़ी थी, तब यहाँ महज़ कुहासा सा फैला रहता था और जाड़ों की धूप में कुछ मजदूर लम्बी पाइपों से पानी छिड़कते रहते थे। वहां जब मेरी रातें अस्पताल के कमरे में चिंता और आशंका के बीच कट रहीं थी, तब यहाँ अनेकों रंगों में जीवन पनप रहा था। यह सब सरल होते हुए भी आश्चर्यजनक है ....होठों से लुप्त हुई मुस्कराहट अनायास ही लौट आती है। मेहनत को धरती ने स्वीकारा है और बताया है की हर ख़ुशी का समय होता है ...प्रयास और प्रतीक्षा का कोई तोड़ नहीं है।

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