Saturday, June 8, 2013

पसेरियहवा

अबके आम न होई ....पर साल भा रहा। मैंने कुछ कौतूहल से उसकी ओर देखा तो उसे लगा जैसे मैं समझ नहीं पाया ...सो उसने मुझे खड़ी बोली में समझाने की कोशिश की। इस साल आम न होगा काहे की पर साल फला था। त्योरिस (दो साल पहले) भी नहीं फला था। अब मुझे आमों से वह लगाव नहीं है जैसा कुछ अरसे पहले हुआ करता था ..जब भोर होते ही दुआरे की खटिया छोड़ नंगे पाँव ही अरहर की खूंटियों को लांघते बाग़ में पहुँच जाता था। कुछ लोग अवश्य मुझसे पहले जागते थे पर इस बाग़ ने कभी मुझको पूर्णतया निराश नहीं किया। इतना तो मिल ही जाता कि अगली सुबह का इंतज़ार रहे।  यह एक सझिया बाग़ है ...सझिया इसलिए क्योंकि प्रत्येक पेड़ के कई हिस्सेदार हैं। किसी का एक बटा चार हिस्सा है तो किसी का एक बटा सोलह। एक परिवार बढ़ा तो उससे दो तीन अलग परिवार उपजे और जैसे जैसे परिवार बढ़े वैसे वैसे हिस्से बढ़े। वैसे तो हर साल ये पेड़ बौरों से लबालब होते हैं पर इनमे से कुछ ही एक साथ ढंग से फल पाते हैं। शेष अगले बरस का इंतज़ार करते हैं। बिलकुल उसी तरह जैसे हम अगले बरस का इंतज़ार करते हैं ...कि शायद अगले साल हमारे जीवन के पेड़ में भी आम लबालब फलें ...और फिर अगले बरस का ...और फिर अगले का। कभी कभी, कहीं कहीं जीवन समय के साथ हिलता डुलता तो है पर औसतन बिलकुल स्थिर प्रतीत होता है। मुझे याद है कि पिछली गर्मियों की छुट्टियों में जब मैं आया था, तब भी उसने यही कहा था ...अबके आम न होई ....पर साल भा रहा।
यूँ तो इस बाग़ में कई पेड़ हैं ; कुछ अभी जिन्दा हैं और कुछ मरणोपरांत यादों में जिन्दा हैं। इन सब के अलग अलग नाम हैं और उन नामों से जुड़ी हुई हैं कुछ कहानियाँ ....मटरअहवा जिसके आम छोटे और गोल होते हैं, मटर के दानों की तरह; अचरअहवा जिसके आम लम्बे होते हैं और उनमे जाली पड़ते ही उन्हें हाथों से अचार के लिए तोड़ लिया जाता है; घंटावह  जिसकी शाखों पर घंट बांधे जाते हैं ; करिययि जिसके आमों का बाहरी आवरण करिया होता है आदि आदि। अब तो इस बाग़ में गिनती के पेड़ बचे हैं; कुछ बूढ़े होकर मर गए और कुछ को मार दिया गया। जिन्हें मार दिया गया आज वहां खेत हैं जहाँ साल भर का चना पैदा होता है; आखिर देसी आमों से कितना पेट भरोगे ..... खटाई और अचार भर का तो दो-तीन पेड़ों से निकल ही आता है ; और यूँ भी इन दिनों अमावट (गाँव की मैंगो जेली) कौन खाता है। मुझे अब भी याद है जब बाग़ के दक्खिनी हिस्से में रातों रात वह विशाल पेड़ गिर पड़ा था जिसे सब पसेरियहवा कहते थे क्योंकि उसका एक एक आम पसेरी का हुआ करता था। हालाँकि उसके आम बहुत खट्टे थे और अधिकतर उन्हें अचार, खटाई और चटनी के लिए कच्चा ही तोड़ लिया जाता था पर वह पेड़ साल दर साल अपने इन भारी आमों को बहुत लगन से जीता रहा।  बुढापे में यह भार जब नहीं ढो पाया तो एक रात धम्म से धरती पर आ गिरा। महीने भर इसकी लकड़ियाँ कट कट कर गाँव में जाती रहीं और आज भी कई कच्चे घरों की छतों पर खपरैलों को अपनी छाती पर बिठाये साँस लेती हैं। पसेरियहवा जहाँ पर था, वहां कई सालों तक एक गड्ढा बना रहा जो बाद में हल की जुताई के बाद समतल हो गया। आप ने अमूमन ऐसे लोगों को देखा होगा जो बहुत मीठा नहीं बोलते पर जब तक जीते हैं, पूरी निष्ठा से अपनी जिम्मेदारियाँ ढोते हैं। उनका उपयोग पूरा कुनबा करता है और तनख्वाह मिलने से पहले ही खर्चे तैयार रहते हैं।  इसीलिए ऐसे लोग कभी पक नहीं पाते ...कभी पूरे नहीं हो पाते।  फिर एक दिन वो चले जाते हैं ...एक बड़ा सा रिक्त स्थान छोड़ कर पर बरसों तक वह परिवार उनके न रहने की पेन्शन पाता है। ऐसे लोग परिवार के पसेरियहवा होते हैं। जब तक परिवार को पेंशन मिलती है, तब तक ये दीवार की खूँटी में टंगे रहते हैं।
हम आप सब के घरों में एक पसेरियहवा होता है; वह पूरी शिद्दत से ताउम्र सब का बोझ उठाता है। क्या हम उसे पहचानते हैं या बस जानते हैं ?

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