Tuesday, June 25, 2013

बिजली का तार

अब घरों में बिजली का तार,
बाहर से नहीं दिखता,
हवा में नहीं हिलता,
कंसील्ड होता है,
दीवारों के भीतर चलता है,
और बाहर जीवन पलता है ...
बटन दबाते ही,
बल्ब जल जाता है,
पंखा चल जाता है,
कभी सोचा है,
इनमे करंट कहाँ से आता है,
कौन है जो दिखाई नहीं देता,
पर तपता है,
जो बटन और बल्ब के बीच की
दूरी में नपता है ....
बरसों तक ये तार,
घुटन में सांस लेता है,
अपने दोनों सिरे से छीला जाता,
और निर्दयता से कसा जाता है,
पर क्या कभी तार में भी,
कोई जुगनू जगमगाता है ....
ये कविता ,
बिजली की कार्यप्रणाली नहीं है,
स्थिर ...झेलता हुआ तार है,
बहता पानी नहीं है,
इस प्रणाली में हम,
कभी बटन कभी बल्ब हैं,
हमारा अपना संसार है,
पर हमें सींचता,
कोई कंसील्ड तार है,
वो कभी माँ कभी पिता,
भाई, बहन या यार है,
दीवारों में दफ़न सही,
पर वही सच्चा प्यार है,
और यदि हम उसकी उपेक्षा करें,
तो हमें धिक्कार है .....
इस मोहमयी जीवन में,
तभी होगा हमारा उद्धार,
जब हम भी बन सकेंगे,
कंसील्ड बिजली का तार।


No comments:

Post a Comment