Tuesday, July 9, 2013

जब जब लिहाफ़ की सिलाई उधड़ जाती है,
और नज़रें सुई का छिद्र नहीं खोज पाती,
जब लालटेन की रुसवाई उजाला सोख लेती है,
और सलाखों से बिलाव की चमकती आँखें घूरती हैं,
तब तुम कहाँ जाते हो,
क्यों नहीं व्योम बनकर गली में उतर आते हो !

उजली पोशाकों में करिया करवाता है,
कोयल की बोली में कौवा बतियाता है,
विज्ञान का अधमरा मानव क्यों न शर्मिंदा हो,
कैसे विश्वास करें कि तुम अब भी जिंदा हो,
यूँ तो अभी भी खेतों की सरसों पीली है,
पर कई ओसारों में भरोसे की मिट्टी गीली है….

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