Saturday, July 20, 2013

कुछ सपन औ आस हमने भी गढ़े थे,
पाँव चादर से मगर शायद बड़े थे,
अब सयानी सी हकीकत घूरती है,
कैसे कैसे ख़्वाब लेकर हम चले थे …

जिंदगी अभिप्राय क्या औ क्या है दोहन,
मुरलियों की तान है ओझल है मोहन,
जम गए क्यों पग जहाँ पर हम खड़े थे,
कैसे कैसे ख़्वाब लेकर हम चले थे ….

बिन भरे ही खेत में ज्यों धान बोता,
स्वप्न तो बस स्वप्न जैसा ही है होता,
हंडियां भूतल में गहरे पर गड़े थे,
कैसे कैसे ख़्वाब लेकर हम चले थे ….


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