रात ढली तब आवाजों से हमने लोगों को पहचाना,
पर कुछ बदल गयीं आवाजें हमने थोड़ी देर से जाना,
भोर जब हुई जाने माने चेहरे वही सयाने से थे,
अब क्या ग्लानि करे है मानव तब क्यों कोई बाँध न माना ;
उलझी डोरों को सुलझाते कैसे गुज़रा एक ज़माना,
कैसे संभली उखड़ी साँसें, कैसे बदला रोज़ ठिकाना,
बीते बरस अतीत हो चले लेकिन अब भी याद है 'नीरज',
एक दिवस जब छलक गया था हाथों से तेरे पैमाना।

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