कोई चट्टान खिसक कर एक नया महकमा बनाती है। एक नया मुकाम, नया आयाम ....और फिर ऊपर देखती है जहाँ से वह आई है।
अपने नीचे नहीं देख पाती क्योंकि उसकी आँखें ऊपर को ही हैं। उसके लिए ये कोई त्रासदी नहीं ... वह पानी की गुलाम है और यह उसका अपना स्वभाव है।
नीचे से ऊपर जाना मंजिल की खोज है… ऊपर से नीचे इंसानी मंजिलों की खोज का परिणाम है।
पानी ऊंचाई नहीं ढलान देखता है और उन्ही ढलानों की तलहटियों में इंसान भगवान खोजता है।
यह महज़ प्राकृतिक आपदा नहीं, यह तो होता रहा है ...होता रहेगा। इंसान यहाँ ईंट सीमेन्ट से खेलता रहा ....बालू यहाँ पर्याप्त थी।
हर स्वार्थ धुंए की शक्ल में ऊपर इकट्ठा होता रहा .... और कई सालों के बाद बादल बन गया।
ऊपर से बादल को कुछ नहीं दिखता ...वो केसरी झंडा भी नहीं जो मंदिर के ऊपर फडफडाता है।
और तुम देख नहीं पाए ...तुम्हारी मंशाएं और थीं ...या शायद तुम्हारे पास दृष्टि का अभाव है।
हम अपने घरों में भगवान् नहीं ढूंढ पाए .... हमें भी अपनी तलाश है।
अब तो बस चितकबरी वर्दियों के आगोश में ही गर्माहट है। इस तरह से कब हेलिकॉप्टर में उड़ना चाहा था।
देश की खादी पर कोई फर्क नहीं पड़ता। मरे हैं तो क्या ...पैदा भी तो हो रहे हैं।
पहाड़ की तृष्णा पहाड़ ही जाने।
और कितने संकेत चाहिए ....अब वहां एक सैनिक छावनी मत खोल देना। ये जांबाज भी प्रकृति से नहीं लड़ पायेंगे।
.................................thinking aloud
No comments:
Post a Comment