Sunday, December 15, 2013

खाली समय कितना कुछ भर जाता है ; एक आँकलन, एक सोच … एक मन ही मन तैयारी ; एक उड़ान लेता जहाज़ किसी अपने के साथ, कहीं बुढ़ापे से रोज़ संघर्ष करता बुढ़ापा, गाँव में दस्तखत देता जाड़ा, ट्रेन का रिजर्वेशन, कॉलेज की फीस, पानी मांगते गमले, दोस्त, नौकरी, किराया, पेट्रोल  …… खाली समय कितना कुछ भर जाता है ;

सूरज चढ़ते चढ़ते ठहर सा जाता है; मोबाइल पर उँगलियाँ हरकत करके फिर खामोश हो जाती हैं; हकीकत से रुबरु होना एक सबब भी है और सबक भी;
जिन हथेलियों पर आँसू रोपे थे वहाँ दूब अब भी हरी है; ​
​मँडराने दो मेरे इर्द गिर्द इस अजीब सी बेचैनी को; कल फिर सोमवार आने को है ​
​; पहिये अपने आप चलेंगे। ​

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