कभी देखा है,
किसी पेड़ की शाखाओं को,
जैसे मदमस्त हवा में,
झूमती बालाओं को,
कोई शाख तिरछी नज़रों सी,
कोई मीठी छूरी सी,
कोई हिरनी सी चंचल,
कोई अभी अधूरी सी,
पर एक शाख,
जिस पर वजन है लदा,
संभालना चाहती है खुद को,
पर झुकी रहती है सदा ,
फिर एक दिन वो,
किसी बवंडर में फंस जाती है,
पेड़ जवान रहता है,बहुत कोशिश करती है,
झूलती है, लड़ती है,
पर हवा और वज़न के दबाव में,
टूटकर गिर पड़ती है,
आज देखा किसी टूटी शाख को,
ज़मीन पर पड़ी थी ढेर,
फिर देखा कहाँ से गिरी,
आदमी था या पेड़।

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