समूची रात एक चाँद नहीं सोख पायी। करवट बदलते बदलते सिलवट पड़ गयी बिस्तरे
पर …. पर वो देखता ही रहा मुझे। मैं अधखुली आँखों से उसे अपने से दूर करता
रहा … पास का आलिंगन अब सहा नहीं जाता। हल्की हवा में पत्ते रात भर
हिले … जैसे दूर कोई सोहर गाता हो। ख्यालों की पंखुड़ियों के दरम्यान पलकें
कब शिथिल हुईं आभास न हुआ। सुबह ऐसा क्यूँ लगा जैसे वह भोर में मेरे पास
ही था। मेरी हथेलियों पर उसके ठंडक की गरमाहट थी। क्यूँ खिड़की का एक पट
खुला था।
……… मेरी खिड़की पर ये दस्तक यूँ ही न थी।
……… मेरी खिड़की पर ये दस्तक यूँ ही न थी।

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