Wednesday, October 16, 2013

अनिश्चित कुछ भी नहीं, निश्चित भी नहीं;  जो हो गया वह होना था , जो होगा वह होना है;  यह दिलासा नहीं, अध्यात्म नहीं, कोई आशा भी नहीं , किसी होनी अनहोनी की परिभाषा भी नहीं, यह तो बस यथार्थ है; जीवन का समय और समय का जीवन है।
उन दिनों के पलाश अब नहीं दिखते ; खुशबुओं का अम्बार इसी मकान की नींव में दफ़न है; एक लोटे पानी से अब प्यास नहीं बुझती ; बाल्टी भर नहाने पर भी शरीर गर्म ही रहता है। एक और दशहरा विजय चाहता है  …. पर कैसे !
कभी कभी बीती रातों का ज्वर सुबह ही तपता है।  ठंडक का थोड़ा धुआँ जलाना होगा !

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