अनिश्चित कुछ भी नहीं, निश्चित भी नहीं; जो हो गया वह होना था , जो
होगा वह होना है; यह दिलासा नहीं, अध्यात्म नहीं, कोई आशा भी नहीं , किसी
होनी अनहोनी की परिभाषा भी नहीं, यह तो बस यथार्थ है; जीवन का समय और समय
का जीवन है।
उन दिनों के पलाश अब नहीं दिखते ; खुशबुओं का अम्बार इसी मकान
की नींव में दफ़न है; एक लोटे पानी से अब प्यास नहीं बुझती ; बाल्टी भर
नहाने पर भी शरीर गर्म ही रहता है। एक और दशहरा विजय चाहता है …. पर कैसे !
कभी कभी बीती रातों का ज्वर सुबह ही तपता है। ठंडक का थोड़ा धुआँ जलाना होगा !
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