Thursday, November 7, 2013

कुछ सालों बाद तुम्हे देखा ; अब भी वैसे ही खड़े हो जैसे सब दिन से थे ; पता नहीं इतनी लम्बी ज़िंदगी तुम कैसे काट रहे हो ; न तो कभी तुम पर एक भी खज़ूर फला और न ही तुम किसी और   काम आये ; खड़े रहे वहाँ जहाँ दुआर ख़त्म होता है और खेत शुरू ; अर्से से तुम अपने सामने बोयी आलू को निहारते रहे  .... उन्हें हर साल खुदते हुए देखते रहे; तुमने सब देखा है अपनी ऊंचाई से  …चुपचाप .... कभी कुछ नहीं बोले और गाँव बदलता रहा।  तुम्हे याद भी है कि कभी हम तुम्हारे नीचे गोबर इकट्ठा करते थे और खाद बन जाने पर उसे खेतों में फेंक देते थे।  खाद उठाते वक़्त मेरे हाथ में जब बिच्छू ने डंक मारा था तब तुम बहुत हँसे थे शायद। आज तुम्हे देख कर  अचरज हुआ ; क्या तुम ज़रा भी नहीं बदल सकते थे ? तुम परिवर्तन कैसे हो सकते हो जब तुम खुद ज़माने से स्थिर हो;  पर परिवर्तन तो हुआ है तुम्हारे इर्द गिर्द। कच्चे घर गिर गए हैं और ईंटों के आश्रय बन गए हैं ; लोग पहले से अधिक धूर्त हो गए हैं ; यूरिया खेतों के पेट में अल्सर बन गयी है ; और तुम्हारे सामने बैलों की जगह अब ट्रैक्टर चलते हैं ; पर तुम कुछ नहीं बोलते  .... मूक बने रहते हो ।  तुम कितना मेरी तरह हो ; इसीलिए मेरे प्रिय भी हो ////

मेरी पैदाइश , मेरा गाँव , मेरे गवाह  ………

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