सांझ की बरसात गज़ब निकली,
तुम जगे तो रात गज़ब निकली,
अरमानों की बातें करते हुआ सवेरा,
फिर मुरादों की बारात गज़ब निकली;
क्या हुआ की कसक अब भी बाकी है,
राख में दबी आग अब भी बाकी है,
एहसान तेरा फिर भी रहेगा मुझपर,
तेरे सौगातों की तादाद गज़ब निकली;
रहो या न रहो तुम, ये राहें रहेंगी,
चमकेंगे जुगनू, फिजायें रहेंगी,
बेशक चले साथ पल भर ही नीरज,
उस पल भर की झंकार गज़ब निकली...
तुम जगे तो रात गज़ब निकली,
अरमानों की बातें करते हुआ सवेरा,
फिर मुरादों की बारात गज़ब निकली;
क्या हुआ की कसक अब भी बाकी है,
राख में दबी आग अब भी बाकी है,
एहसान तेरा फिर भी रहेगा मुझपर,
तेरे सौगातों की तादाद गज़ब निकली;
रहो या न रहो तुम, ये राहें रहेंगी,
चमकेंगे जुगनू, फिजायें रहेंगी,
बेशक चले साथ पल भर ही नीरज,
उस पल भर की झंकार गज़ब निकली...
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