बड़े अरसे से हवाओं में समंदर डोलते थे,
भिगो जाती थी लहरें, चक्षु पानी सोखते थे,
दिलों में टीस बनकर रेत की मानिंद यादें,
गुज़र जाती थी ज्यों ही मुट्ठियाँ हम खोलते थे;
नहीं अब कुछ बचा कि आया शायद ज़लज़ला होगा,
कहीं रेतों कि गहराई में औंधा मन दबा होगा,
किनारों से गुज़रती हैं हवाएं अब भी ऐ नीरज,
मगर लहरों का पानी आँख से शायद बहा होगा...
भिगो जाती थी लहरें, चक्षु पानी सोखते थे,
दिलों में टीस बनकर रेत की मानिंद यादें,
गुज़र जाती थी ज्यों ही मुट्ठियाँ हम खोलते थे;
नहीं अब कुछ बचा कि आया शायद ज़लज़ला होगा,
कहीं रेतों कि गहराई में औंधा मन दबा होगा,
किनारों से गुज़रती हैं हवाएं अब भी ऐ नीरज,
मगर लहरों का पानी आँख से शायद बहा होगा...
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