Sunday, July 17, 2011

क्यों ज़ुदा देखा

देखने को तो एक ही मंज़र था,
तेरी आँखों ने क्यों ज़ुदा देखा;

अपनी रातों की बात करते हो,
हमने दिन का भी फासला देखा;

ऐसा लगता था लौट आये हो,
घूम कर हमने आइना देखा;

आज़ दीवारें भी नहीं सुनती,
हमने फिर से नया मकां देखा;

जिंदगी एक सी नहीं रहती,
वक़्त ने वक़्त का सिला देखा;

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