देखने को तो एक ही मंज़र था,
तेरी आँखों ने क्यों ज़ुदा देखा;
अपनी रातों की बात करते हो,
हमने दिन का भी फासला देखा;
ऐसा लगता था लौट आये हो,
घूम कर हमने आइना देखा;
आज़ दीवारें भी नहीं सुनती,
हमने फिर से नया मकां देखा;
जिंदगी एक सी नहीं रहती,
वक़्त ने वक़्त का सिला देखा;
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