तुम चलते हो तेज़ मैं आगे धीरे थोड़ा बढ़ता हूँ,
तुम पहुंचे फुनगी पर, मैं डाली डाली चढ़ता हूँ,
तुझमे मुझमे थोड़ा सा स्वाभाविक है गति का अंतर,
चलना ही है काम निरंतर.
न ही कविता सार बचा अब, न ही बचा कोई भवसागर;
जब से चलना सीखा तूने, छलकाती जाती है गागर,
मेरे क़दमों में बांधा था काल ने कोई जैसे बाधक,
पर तेरी खनकाती पायल बना गयी मुझको इक साधक,
चलता हूँ मैं धीरे क्योंकि नहीं जानता कोई जंतर,
चलना ही है काम निरंतर..
चलते चलते नया है पाया, किन्तु पुराना खोता आया,
जिस पनघट की डगर कठिन है, वहीँ मोक्ष था हमने पाया,
प्राची का पट खुल न पाया, तम की लम्बी इतनी काया,
किन्तु हमारे प्रबल स्वरों ने, नया सूर्य कोई उगवाया,
कठिन सहज सब एक सा लगता, दूर हुए थे सारे अंतर,
चलना ही है काम निरंतर...
करूँ वंदना कैसे तेरी, तुम सुलझे हो, समझाओगे,
पर मैं भी इक ऐसा पागल, जैसा कहीं नहीं पाओगे,
अपनी अपनी रातें हैं ये, अपना ही है कोई सवेरा,
जब सब कुछ ही छोड़ है जाना, फिर तेरा क्या, क्या है मेरा,
पर जब तक जिंदा हूँ माते, मेरा भी है एक दिगंतर,
चलना ही है काम निरंतर...
तुम पहुंचे फुनगी पर, मैं डाली डाली चढ़ता हूँ,
तुझमे मुझमे थोड़ा सा स्वाभाविक है गति का अंतर,
चलना ही है काम निरंतर.
न ही कविता सार बचा अब, न ही बचा कोई भवसागर;
जब से चलना सीखा तूने, छलकाती जाती है गागर,
मेरे क़दमों में बांधा था काल ने कोई जैसे बाधक,
पर तेरी खनकाती पायल बना गयी मुझको इक साधक,
चलता हूँ मैं धीरे क्योंकि नहीं जानता कोई जंतर,
चलना ही है काम निरंतर..
चलते चलते नया है पाया, किन्तु पुराना खोता आया,
जिस पनघट की डगर कठिन है, वहीँ मोक्ष था हमने पाया,
प्राची का पट खुल न पाया, तम की लम्बी इतनी काया,
किन्तु हमारे प्रबल स्वरों ने, नया सूर्य कोई उगवाया,
कठिन सहज सब एक सा लगता, दूर हुए थे सारे अंतर,
चलना ही है काम निरंतर...
करूँ वंदना कैसे तेरी, तुम सुलझे हो, समझाओगे,
पर मैं भी इक ऐसा पागल, जैसा कहीं नहीं पाओगे,
अपनी अपनी रातें हैं ये, अपना ही है कोई सवेरा,
जब सब कुछ ही छोड़ है जाना, फिर तेरा क्या, क्या है मेरा,
पर जब तक जिंदा हूँ माते, मेरा भी है एक दिगंतर,
चलना ही है काम निरंतर...
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