इसमें हमारा यथार्थ है,
जो बची खुची आक्सीज़न में,
सांस लेता है,
और इसमें है कल्पनाओं का भण्डार,
जो आँख खोले है,
पर बीच बीच सोता है;
इसमें ही भावनाओं का अम्बार है,
थोड़ी हंसी है,
थोड़े हैं आंसू,
एक चहकता परिवार है;
इसमें ही मन है,
चाहतों का दर्पण है,
जिसमे शक्ल नहीं दीखती,
पर इनपे सब अर्पण है...
इसमें हमारा कल है, आज है,
और कल का मनन है,
और इसमें हम कितना ही झगड़ लें,
इसमें ही अमन है,
यूँ तो ये बहुत छोटा है,
पर इसमें कितना कुछ भरा है,
ये शायद जादुई है,
क्योंकि सच्चा है, खरा है,
ये किसकी माया है,
ये कैसे रचाया है,
कि इतने छोटे से डिब्बे में,
जीवन के हर पहलू की,
लचकती एक डाली है;
और हम कितना भी भर लें,
ये डब्बा,
फिर भी खाली है.............
जो बची खुची आक्सीज़न में,
सांस लेता है,
और इसमें है कल्पनाओं का भण्डार,
जो आँख खोले है,
पर बीच बीच सोता है;
इसमें ही भावनाओं का अम्बार है,
थोड़ी हंसी है,
थोड़े हैं आंसू,
एक चहकता परिवार है;
इसमें ही मन है,
चाहतों का दर्पण है,
जिसमे शक्ल नहीं दीखती,
पर इनपे सब अर्पण है...
इसमें हमारा कल है, आज है,
और कल का मनन है,
और इसमें हम कितना ही झगड़ लें,
इसमें ही अमन है,
यूँ तो ये बहुत छोटा है,
पर इसमें कितना कुछ भरा है,
ये शायद जादुई है,
क्योंकि सच्चा है, खरा है,
ये किसकी माया है,
ये कैसे रचाया है,
कि इतने छोटे से डिब्बे में,
जीवन के हर पहलू की,
लचकती एक डाली है;
और हम कितना भी भर लें,
ये डब्बा,
फिर भी खाली है.............
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