वन में हो या भवन में हो ,
आदमी, अपनी ख़ुशी खोज़ लेता है,
फिर ये कौन है जो इस भीड़ में,
न होने की कमी देता है ;
महज़ सोचने से सूखी आँखों में,
क्यों यादों कि नमी देता है;
जीने क़ी सजा ही काफ़ी थी,
क्यों दो गज ज़मीं देता है;
आदमी, अपनी ख़ुशी खोज़ लेता है,
फिर ये कौन है जो इस भीड़ में,
न होने की कमी देता है ;
महज़ सोचने से सूखी आँखों में,
क्यों यादों कि नमी देता है;
जीने क़ी सजा ही काफ़ी थी,
क्यों दो गज ज़मीं देता है;
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