Sunday, June 12, 2011

राख की आग

अब रात ही रात में रात बिखर जाती है,
रोज़ अंधेरों में निकली ख्वाहिश किधर जाती है,
यूँ तो दिल बर्फीली रातों में भी हैं झुलसे,
पर राख में लगी आग से रूह भी सिहर जाती है;

अब तो जलने को भी न बचा, अब क्या सोचते हो,
क्यों भट्टियों में धमनियों का क्रोध झोंकते हो,
मुर्दे तो यूँ भी न बोलते हैं, न डोलते हैं,
तुम क्यों मेरे ताबूत में कील और ठोंकते हो;

तुम सदा मुझसे यूँ ही नाराज़ नहीं रहते थे,
गुस्सा होते थे अक्सर पर दूर नहीं रहते थे,
आज तनहाइयों का ज़ुल्म सर चढ़ा है नीरज,
वरना तनहाइयों में भी हम मजबूर नहीं रहते थे;



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