अब भी यकीन नहीं होता
कि कभी यहाँ कश्ती कोई चली होगी ;
सूखी दरारों में ज़मीं है,
और गहराइयाँ भी समतल हो चली हैं,
अलबत्ता कुछ चिकने से पत्थर ज़रूर हैं,
जिन पर से कभी बहुत पानी बहा होगा,
कभी यहाँ भावनाओं कि नदी होगी,
अब भी यकीन नहीं होता
कि कभी यहाँ कश्ती कोई चली होगी ;
कि कभी यहाँ कश्ती कोई चली होगी ;
सूखी दरारों में ज़मीं है,
और गहराइयाँ भी समतल हो चली हैं,
अलबत्ता कुछ चिकने से पत्थर ज़रूर हैं,
जिन पर से कभी बहुत पानी बहा होगा,
कभी यहाँ भावनाओं कि नदी होगी,
अब भी यकीन नहीं होता
कि कभी यहाँ कश्ती कोई चली होगी ;
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