वह सर्वस्व लुटा कर भी ऐतबार करता है,
कैसे कोई पतझड़ की तरह प्यार करता है,
ये आवाज़ भी यूँ रूह तक पहुँचती है,
जैसे कोई हमशक्ल इंतज़ार करता है,
जब वह न मिला तो उसका ग़म ही सही,
ऐसा इंसाफ़ भी परवरदिगार करता है,
ये फ़कत मौसम हैं, एक से नहीं रहते,
वो उम्मीदों में अपना श्रृंगार करता है,
ये कमजोरी नहीं, समझौता है 'नीरज',
किसी के दर से कोई क्यों गुहार करता है,
वो मिले, न मिले, या सवालों में रहे घिरकर,
जवाबों में क्या है, वो तो यूँ ही हिसाब करता है,
जब लुत्फ़ मिलने लगे सर्वस्व लुटाने में,
जान जाओगे कोई क्यूँ प्यार करता है...
कैसे कोई पतझड़ की तरह प्यार करता है,
ये आवाज़ भी यूँ रूह तक पहुँचती है,
जैसे कोई हमशक्ल इंतज़ार करता है,
जब वह न मिला तो उसका ग़म ही सही,
ऐसा इंसाफ़ भी परवरदिगार करता है,
ये फ़कत मौसम हैं, एक से नहीं रहते,
वो उम्मीदों में अपना श्रृंगार करता है,
ये कमजोरी नहीं, समझौता है 'नीरज',
किसी के दर से कोई क्यों गुहार करता है,
वो मिले, न मिले, या सवालों में रहे घिरकर,
जवाबों में क्या है, वो तो यूँ ही हिसाब करता है,
जब लुत्फ़ मिलने लगे सर्वस्व लुटाने में,
जान जाओगे कोई क्यूँ प्यार करता है...
No comments:
Post a Comment