धमाकों का शोर शांत हुआ,
दीयों ने छोड़ा दिल जलाना,
हुई हैं रातें फिर से अपनी,
वही है जलता बल्ब पुराना,
क्या सोचा था, बदल जाएगा !
इक त्योहार से तेरा फ़साना ?
अब भी गरीब की बेबसी दिखती है,
जहाँ जहाँ भी नज़र गयी,
पर देखो कितनी मासूमियत से,
एक दिवाली और गुज़र गयी;
दीयों ने छोड़ा दिल जलाना,
हुई हैं रातें फिर से अपनी,
वही है जलता बल्ब पुराना,
क्या सोचा था, बदल जाएगा !
इक त्योहार से तेरा फ़साना ?
अब भी गरीब की बेबसी दिखती है,
जहाँ जहाँ भी नज़र गयी,
पर देखो कितनी मासूमियत से,
एक दिवाली और गुज़र गयी;
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