Monday, October 3, 2011

कुछ तो कम है

जब भीड़ में भी आँखें शून्य ही निहारती हैं,
जब रातों की भागी नींद दिनों में सताती  है,
जब यादों में यादें ही बेबस पहचान भुलाती हैं,
जब पहचानी सी पदचापें अनायास रुलाती हैं,
तब कुछ तो ग़म है,
तब कुछ तो कम है !!!

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