जब भीड़ में भी आँखें शून्य ही निहारती हैं,
जब रातों की भागी नींद दिनों में सताती है,
जब यादों में यादें ही बेबस पहचान भुलाती हैं,
जब पहचानी सी पदचापें अनायास रुलाती हैं,
तब कुछ तो ग़म है,
तब कुछ तो कम है !!!
जब रातों की भागी नींद दिनों में सताती है,
जब यादों में यादें ही बेबस पहचान भुलाती हैं,
जब पहचानी सी पदचापें अनायास रुलाती हैं,
तब कुछ तो ग़म है,
तब कुछ तो कम है !!!
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