विरह की औ मिलन की पालकी अब साथ चलती है,
कि अब खामोशियाँ, खामोशियों के साथ पलती है,
ये कैसा है नियम, तब्दीलियों का ऐ मेरे मौला,
कहीं पर दिन निकलता है, कहीं पर सांझ ढलती है;
ये कैसा आ गया है वक़्त कि अब तक़दीर कहती है,
तुम्हारी रूह है मज़बूत सभी दुःख सुख को सहती है,
कहीं पर हों धमाके या कहीं पर जश्न की हो रात,
ये कैसी जिंदगी है, मौत के जो बीच रहती है;
कि अब खामोशियाँ, खामोशियों के साथ पलती है,
ये कैसा है नियम, तब्दीलियों का ऐ मेरे मौला,
कहीं पर दिन निकलता है, कहीं पर सांझ ढलती है;
ये कैसा आ गया है वक़्त कि अब तक़दीर कहती है,
तुम्हारी रूह है मज़बूत सभी दुःख सुख को सहती है,
कहीं पर हों धमाके या कहीं पर जश्न की हो रात,
ये कैसी जिंदगी है, मौत के जो बीच रहती है;
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