Wednesday, September 28, 2011

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी

आज फिर एक सांझ की है आने की तैयारी,
प्राकृतिक अंधेरों पर होगा कृत्रिम प्रकाश भारी,
चाहे अलौकिक कर दो या दे दो तिमिर उधारी,
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी...

क्या मेरे झुकने से ही होती है जीत तुम्हारी,
हैं भारी आँखें हरदम कोमल पलकों से हारी,
नशा हार का मुझको, बाज़ी हो या लाचारी,
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी...

पर जलता रहेगा दीपक, रातें हों चाहे बयारी,
जो दिल में फूल खिले हैं, हम सींचेंगे वो क्यारी,
चाहे नयनों में पिघलो, या मेघ बनो मल्हारी,
कुछ बात है  कि हस्ती मिटती नहीं हमारी...

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