Monday, February 20, 2012

जो झरोखे सोचते थे बंद हैं, वो ज़रा सा चरमरा कर हिल गए,
एक झीनी झिलमिलाती आंच में, ये अँधेरे रौशनी से मिल गए,
उम्र भर रह कर सरोवर, जो नहीं फूले थे नीरज,
एक झीनी रौशनी की ताप में, रेत में भी लहलहा कर खिल गए;





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